Home / Antarvasna Hot Sex Story - Adult Sex Stories / वीर्यदान महादान-1

वीर्यदान महादान-1

मित्रो, मैं अन्तर्वासना का पुराना पाठक व लेखक हूँ, चूत-लण्ड के किस्से सुनकर लोगों की तरह मैं भी अपना मन बहला लेता हूँ।
पर इस बार मेरी इच्छा जागृत हुई कि मुझे भी अपनी आत्मकथा आप लोगों को सुनानी चाहिये क्योंकि ज्ञानीजन कहते हैं कि खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं, इसी प्रकार वीर्य भी बांटने से बढ़ता ही है।

मेरा नाम विक्रम कुमार है, प्यार से मेरे मित्र मुझे विक्की भी पुकारते हैं। मेरे पिता एक सरकारी अधिकारी थे, गाँव में उनकी लम्बी चौड़ी खेती व सम्पत्ति थी जिसे चाचा सम्हालते थे, भगवान की दया से कोई कमी नहीं थी।

हम कुल दो भाई ही हैं। पिता जी ने हम दोनों की पढ़ाई-लिखाई भी अच्छे स्कूलों कराई। मेरा बड़ा भाई एम.बी.बी.एस. कर पोस्ट ग्रेज्युशन की पढ़ाई के लिये अमेरिका चला गया व फिर वहाँ उसने अपनी एक सहपाठिनी से ही शादी कर ली व वहीं बस गया।

अब हिन्दुस्तान में रह गये माँ-बाप व मैं, पिताजी नियम कायदे के पक्के थे, अपनी जिन्दगी असूलों के साथ जी रहे थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी गलत काम नहीं किया।

बचपन से ही पिताजी हमें गीता व रामायण के साथ ईमानदारी का पाठ भी पढ़ाया करते थे जिसके फलस्वरूप हम मोहल्ले की लड़कियों को अपनी बहन समझते रहे, तो फिर वही कीटाणु शरीर में पलकर बड़े हुए, जिन्होंने मुझे कभी भी क्लास में पढ़ने वाली लड़कियों को दूसरी नजर से देखने नहीं दे दिया।

वैसे मैं दिखने करने में स्मार्ट हूँ। अतः मेरे साथ पढ़ने वाली लड़कियाँ मुझ पर लाईन मारती थीं, पर मेरा ध्यान सिर्फ पढ़ाई में ही लगा रहा, मैंने अपने मन को भटकने नहीं दिया।
मैं पढ़ाई में अच्छा था, जिसका नतीजा यह हुआ कि मैंने यूनिवर्सिटी की परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास की, फिर उसके बाद मैंने एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से एम बी ए किया, जिसकी बदौलत मुझे एक बड़ी कम्पनी में नौकरी मिल गई।

नौकरी लगने के बाद मेरे साथ काम करने वाली लड़कियाँ मुझ जैसे लायक कुंवारे पर लाईन मारने लगी, पर फिर भी मेरी नीयत नहीं डोली क्योंकि मैंने सोच रखा था कि मैं अपने माता-पिता की मर्जी से ही शादी करुँगा, कारण बड़े भैया के विदेशी मेम से शादी करने से वे दोनों व्यथित थे। तो मैंने सोचा कि शायद मैं उनके पसंद की लड़की से शादी कर लूँगा तो उनका दर्द कुछ तो कम होगा।

अब मेरे दूर दूर के रिश्तेदार मेरे लिये संबंध ले-लेकर आने लगे। फिर कई लड़कियों में से एक शालिनी को मेरे घर वालों ने मेरे लिये पसंद कर लिया।
वह इतनी सुन्दर थी कि मैं भी उसे ना नहीं कर सका।

मैंने बहुत पहले उसे देखा था, पर अब ग्रेज्युएट होने के बाद वह बहुत खूबसूरत हो चुकी थी। पूरे परिवार की रजामन्दी से हम दोनों का विवाह भी हो गया। लोग कहते थे कि हमारी जोड़ी लाखों में एक है।

मैं अपने आपको खुशनसीब समझने लगा। जब शाम को मैं ऑफ़िस से घर लौटता तो वह मेरा इन्तजार करती। हम बहुत घूमने फिरने जाते। कुल मिलाकर मैं एक शानदार शादीशुदा जिन्दगी जी रहा था। फिर रात ढलने पर हम लगभग प्रतीदिन चुदाई समारोह का आयोजन करते थे।

फिर लगभग दो साल बाद हमारा पहला बच्चा हुआ, तो मेरे परिवार व रिश्तेदारों नें बहुत खुशियाँ मनाईं। बेटा पैदा करने के कारण शालिनी का समाज में बहुत मान बढ़ गया। और फिर उसके बाद मुझे लगने लगा कि उसका ध्यान धीरे धीरे मेरी ओर कम व बेटे की तरफ ज्यादा रहने लगा है, पर मैंने यह बात सहजता में ली कि चलो अभी बेटा छोटा है व यह बहुत स्वाभाविक सी बात है कि हर माँ अपने बच्चों को अधिक से अधिक समय देना चाहती है।

फिर समय बहुत तेजी से निकला व मेरी शादी के लगभग आठ साल बाद एक खूबसूरत बेटी पैदा हुई, जो मेरे बेटे से लगभग छहः साल छोटी थी। फिर इस प्रकार हमारा परिवार एक सम्पूर्ण परिवार – सुखी परिवार हो गया। हर तरफ शालिनी की इज्जत बढ़ गई और वह दोनों बच्चों को पालने-पोसने, उनकी पढ़ाई लिखाई में वह इतनी व्यस्त हो गई कि इस दौरान वह अनजाने में ही कब मुझसे दूर हो गई इसका हम दोनों को पता ही नहीं चला।

अब ऐसा लगता था कि उसकी दुनिया सिर्फ उसके बच्चों तक ही सीमित होने लगी है। शालिनी एक पत्नी की बजाय सिर्फ माँ बनकर ही रह गई।
उसके इस बदलाव ने मेरा रोल भी मात्र एक पिता का ही कर दिया, पति का रोल कब खत्म हो गया इसका मुझे पता ही नहीं चला।

जब हमारी नई नई शादी हुई थी तो शालिनी अपने आप मेरी बाहों में आ जाती थी व लगभग रोज ही हम सेक्स करते थे किन्तु जैसे ही बेटा हुआ उसके बाद उसने ना-नकुर चालू कर दी। मतलब सप्ताह में एक बार से ज्यादा सेक्स नहीं करने देती व अपने उन्नत स्तनों तो भी छूने नहीं देती, कहती- अब तो ये आपके बेटे के लिये हैं, इनमें भरा दूध भी सिर्फ उसके लिये ही है।

और फिर और समय निकला व बिटिया के जन्म के बाद तो हम लोग सेक्स महीने में दो-तीन बार ही करने देती। उसके लिये भी शालिनी के हाथ पैर जोड़ने पड़ते थे, मतलब वह कभी इच्छा से तो मेरे पास आती नहीं, वरन जब भी मेरा सेक्स करने मूड बनता व मेरा लण्ड खड़ा होता तो वह निश्चित रूप से उसके एक घण्टे बाद ही आकर लेटती थी।

उस पर भी उसके हजार नखरे रहते, कि आज तो मेरा मन नही हैं, तुम्हें तो इसके अलावा कुछ और नहीं सूझता, जल्दी से कर लो जो करना हो, चूत में बहुत जलन हो रही है, आज तो एम सी है, आज तो सफेद पानी बह रहा है, अभी बच्चों का होमवर्क कराना है, आज व्रत है, सुबह जल्दी उठना है, आज कमजोरी लग रही है इत्यादि जैसे हजारों बहानो का उसके पास भण्डार था, जिनका उपयोग कर वह मुझे किसी ना किसी रूप से मेरे लण्ड को हतोत्साहित करती थी।

अब मैं ठहरा गबरु जवान जिसका रोज चुदाई करने का मन करता हो। उपर से पत्नी भी अनिंद्य सुन्दरी, पर वह मेरे क्या काम की। उसके उन्नत स्तन देखकर मैं बस मन मसोस कर रह जाता क्योंकि अब वे तो सिर्फ मेरी बेटी के दूध की बोतल बन कर रह गये थे।

संतुष्टि नहीं मिलने के कारण, अब मेरा ऑफ़िस में भी काम में मन नहीं लगता था, अब मेरी जिन्दगी में सेक्स नहीं होने से ठीक वैसे ही लगने लगा जैसे मैं बिना नमक का खाना खा रहा हूँ। मैंने शालिनी को कई बार समझाने की भी कोशिश की, तो वह मेरे जिद करने पर वह टाँगें चौड़ी कर लेट जाती व कहती लो कर लो जो करना हो..

कई बार मजबूरी में मैंने उसकी इच्छा के विरुद्ध सेक्स किया भी, तो वह सीधे लण्ड उसकी चूत में डाला व फिर कुछ देर आगे पीछे धक्क देकर हिलाया व पानी छोड़कर निकाल लिया। वह मुझे स्तनों पर हाथ भी नहीं लगाने देती, कहती- ये तो मेरे बच्चों के लिये हैं।

अब मुझे लगने लगा शालिनी की चूत मेरे लिये मजे का इन्तजाम ना होकर उसके लिये मात्र मूत्र विसर्जन का साधन ही होकर रह गई है। यहाँ तक की उसकी चूत की गर्मी भी खत्म हो चली थी, जब मैं उसकी मुनिया में कभी कभार अपना पप्पू प्रविष्ट करता था तो ऐसा लगता था, जैसे किसी ने मेरे लण्ड के आसपास बर्फ जमा दी हो।

मेरी पत्नी पतिव्रता है और इसी प्रकार मैंने भी अपनी जिन्दगी में किसी ओर औरत की ओर आँख उठाकर नहीं देखा पर उस सबसे क्या होता है, यह सब तो सिर्फ सिद्धांत की ही बाते हैं ना, जब अपना लण्ड खड़ा हो तो पानी छोड़ने के लिये चूत की ही जरूरत होती है।

दिन पर दिन हालात बदतर होते जा रहे थे। अब तो महीने में एक आध बार से ज्यादा मेरे लण्ड की आग शांत नहीं होती थी। अब मैं बाथरूम में जाकर हस्तमैथुन करके जैसे तैसे उसे ठण्डा करने की कोशिश करने लगा।

अब मुझे रातों को भी नींद भी कम आने लगी व इसी कारण से दिन में ऑफ़िस में भी काम में मन नहीं लगता था। समझ में नहीं आता था कि मैं अब क्या करूँ। फिर मन में कई विचार आने लगे कि मैं अपने ऑफ़िस की किसी महिला को फंसा लूँ क्योंकि मैं जानता था कि सिर्फ मेरे इशारा करने की देर है, कोई भी खुद ब खुद मेरी गोद में आकर बैठ जायेगी पर बात तो खुलेगी ही व ऑफ़िस में मेरा जो सम्मान है वह निश्चित रूप से कम हो जायेगा।

घर पर काम वाली बाई जो खुद पटाखा थी के बारे में भी सोचा जा सकता था, पर मुझे वहाँ भी डर था कहीं शालिनी को पता चल गया तो मेरी शादीशुदा जिन्दगी तबाह हो जायेगी।

फिर मैंने सोचा कि किसी कालगर्ल का सहारा लूँ पर वहाँ भी बिमारी का डर लगता था। मैं अपने लण्ड की आग ज्यों ज्यों मैं दबाता तो फिर यह त्यों त्यों और भड़कती। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं कैसे इस आग को बुझाऊँ।

इसी तरह समय गुजरता गया।
कहानी जारी रहेगी।

Check Also

गर्लफ्रेंड को झाड़ियों में ले जाकर चुदाई की

एक शादी में एक लड़की मुझे अच्छी लगी, वो भी मुझसे नैन लड़ा रही थी. …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *