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मेरे जीवन की अजब गजब दास्ताँ

मैं नौकरी के तलाश में एक शहर आया गांव का सीधा सादा लेकिन थोड़ा शरारती किस्म का नौजवान हूँ. मैं एक स्कूल में टीचर लग गया और स्कूल से कुछ ही दूर एक घर किराये पर लेकर रहने लगा.
उस घर में 3 लड़कियाँ और उनकी माँ थी बस. बड़ी लड़की कहीं प्राइवेट काम करने जाती थी, और माँ कई घरों में काम करती थी. 2 लड़कियाँ एक डेढ़ साल की छोटी बड़ी थी, वो भी मेरे स्कूल की छात्रा थी. मैं उनकी पढ़ाई में हेल्प करने लगा और उनके ही घर में रहने लगा।

जब भी समय मिलता, कोई भी लड़की मेरे कमरे में आ जाती और बातें करने लगती।

एक दिन बारिश थी, मैं स्कूल नहीं गया.
दोपहर को मैं अपने पलंग पर बैठा था कि किसी की आवाज कमरे में आने की आई, वो मंझली लड़की थी, पानी से भीगी हुई आई और बोली- मां कहां है?
मैंने कहा- पता नहीं, वो अभी तक नहीं आई?
‘देखो ना दरवाजा बंद है!’
‘और छोटी?’
‘वो स्कूल में ही रुकी होगी, पानी गिर रहा है ना!’

‘तू तो पूरी भीग चुकी है!’
‘देखो ना, रास्ते में पानी ज्यादा गिरने लगा और मैं दौड़ कर आई!’ वो दरवाजे के पास ही खड़ी थी पानी से भीगी हुई.
‘चल जा अंदर कपड़ों का पानी निचोड़ कर तौलिए से पौंछ ले!

उसने अपना बस्ता नीचे रख दिया तो मेरी नजर उसके बदन पर जा टिकी, पूरे पूरे गोल गोल मम्मे तने ही साफ दिखाई दे रहे थे, ब्रा नहीं पहनी थी, उसके चूचुक तने हुए मानो कह रहे हों ‘मुंह में लेकर चूस लो!’
मैं ऐसा सोच रहा था कि मेरा लंड खड़ा होने लगा और वो मेरे को ही देख रही थी.

मैंने अपने हाथ से पकड़ कर अंदर खींचा और वो अंदर आ गई. मैंने देखा कि उसकी आँखों में एक अलग कशिश थी मानो वो कह रही हो ‘आज मौका अच्छा है, चल चुदाई कर लें!

मैंने अपने हाथ उसके शर्ट के ऊपर रख कर उसके दूध को दबा दिया, वो चिहुंक गई पर मुझे प्यार से देख रही थी।
मैं उसे कमरे में ले आया और वो अन्दर बाथरूम में जाकर अपने कपड़ों से पानी निचोड़ रही थी, मैं वहीं से उसे देख रहा था.

जैसे ही उसने शर्ट निकाला, मैं उसके जिस्म को देख कर खुद को रोक नहीं पाया और आगे बढ़ कर उसे अपनी बांहों में ले लिया और मैंने उसकी शमीज ऊपर कर दी, दोनों हाथों में मम्मे लेकर चूसने लगा. वो भी कम नहीं थी, मेरे लंड को निकाल चुकी थी और अपने हाथ में लेकर सहलाने लगी.

मैं अब अपने कपड़े और उसके कपड़े भी निकालने लगा. अब हम दोनों बिना कपड़ों के एक दूसरे के अंगों को गर्म कर रहे थे. मैं अपने को भाग्यशाली समझ कर पूरे जोश से उसे गर्म करने लगा और वो अपने को मेरे हवाले कर चुकी थी.

मैंने उसकी चूत पर हाथ रखा तो वो अपने पैर फैलाने लगी और मैं उसे पंलग में लेजा कर अपना लंड उसकी चूत में घिसने लगा. उसने खुद ही अपनी चूत में लंड टिकाया और झटका मार दिया. लंड अंदर चूत में चला गया उम्म्ह… अहह… हय… याह… और वो मेरे को किस पे किस करने लगी.
मैं भी उसे धक्के मार मार कर चोदने लगा और हम दोनों चुदाई का मजा लेने लगे।

कुछ देर बाद पूरा बदन अकड़ने लगा, तब दोनों अपना माल गिराने वाले थे, मैंने कस कर चूत चुदाई शुरू कर दी और दोनों एक साथ झड़ कर वहीं निढाल होकर गिर पड़े.

काफी समय बाद अलग होकर मैं अंदर फ्रेश होने गया. तभी मैंने किसी के आने की आवाज सुनी, देखा तो दरवाजे के पास छोटी खड़ी थी जो अपनी बहन को पूरी नंगी पलंग में लेटी हुई देख गुस्से से नीचे चली गई.

मैंने उसे उठाया और बताया कि उसकी बहन ने उसे नंगी देख लिया है, वो अपने कपड़े पहन तुरन्त नीचे चली गई और हम दोनों उसे पटाने लगे कि किसी को ना बताना!
मैंने उसे कुछ रूपये भी दिये और घुमाने ले जाने और नये कपड़े का लालच दिया पर वो कुछ नहीं बोली.

मैं चुपचाप अपने कमरे में आ गया, सोचा कि आज तो गया… ये क्या हो गया मेरे से!
मैं डर गया था.

दूसरे दिन छोटी आई और कहा- माँ बुला रही है!
मेरी फटी मगर फिर भी हिम्मत कर चला गया.

उसकी तीनों लड़कियाँ पलंग पर बैठी थी. उनकी मां ने जाते ही कहा- मैंने आपको इसलिए बुलवाया है मुझे कुछ रूपयों की जरूरत है, हम आपको अगले माह दे देंगे.
मेरी जान में जान आई, मैंने कहा- चल ऊपर छोटी, ले आना!

मैंने अंदर जाकर कुछ रूपए निकाल कर उसकी हथेली में रकहते हुए उसके हाथ को पकड़ लिया और वो विरोध करने के बजाय मुस्करा कर चली गई.
मैंने अब राहत की सांस ली.
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अब तो मंझली और मैं ज्यादा खुल चुके थे, जब भी मौका मिलता, हम चुदाई करने लगे, अब तो एक पल भी दूर रहने को मुश्किल लग रहा था, बस चुदाई के सिवाय कुछ और नहीं दिखता था. छोटी हमें कई बार रंगे हाथ पकड़ चुकी थी पर वो मान भी जाती और हम खुश थे, उसे हर संभव खुश रखना हम दोनों की मजबूरी था.

ऐसे ही दिन बीतते गए और समय निकलने लगा।

एक रात मंझली मेरे कमरे से रात को चुदाई करा कर जा रही थी कि सबसे बड़ी बहन ने उसे मेरे कमरे से निकल कर जाते देखा, उसने अपनी माँ को बता दिया.
फिर हमने माँ को पूरी बात बता दी और हमने शादी कराने को कहा.

तो मां ने कहा- कुछ दिन बाद शादी कर देंगे लेकिन तब तक तुम नहीं मिल पाओगे!
हमने वैसा ही किया और उनकी इजाजत से शादी कर ली।

दोनों का मधुर जीवन चलता रहा और एक बच्चे के आने की खुशी हम सभी को थी. मगर भाग्य में कुछ और था, बच्चे का जन्म तो हुआ मगर मेरा प्यार बिछुड़ गया… बच्चे को जन्म देते समय वो नहीं रही.
मैं टूट चुका था… क्या करता… कुछ समझ नहीं आ रहा था… बच्चा इतना छोटा कि परवरिश कैसे होगी.
मगर सासू माँ ने कहा- यदि आप चाहो तो मेरी एक बेटी से शादी कर लो, जिससे इस समस्या का निपटारा हो जायेगा.

मैं चुप था, मगर बड़ी ने कहा- क्या सोच रहे हो? आप कहें तो मैं यह जिम्मेदारी ले सकती हूँ।
और फिर शादी हो गई मगर कुछ दिनों में असलियत सामने तब आई जब वो सज धज कर नौकरी के लिए निकली. मैंने उसे अपने पर्स में कंडोम का पैकेट रखते देखा. उसने भी मुझे देखते हुए देख लिया पर फिर भी बाय कह निकल पड़ी.

मेरा मन में शंका हुई कि यह कंडोम क्यों ले जा रही है और वो भी सज धज के!
मैंने उसके अलमारी की तलाशी ली, उसमें कुछ आपत्तिजनक चीजें मिली, मैंने जब उनके बारे में पूछा तो लड़ने लगी और बात इतनी बढ़ गई कि उसकी छोटी बहन आ गई, वो उसे समझाने लगी तो उसे खरा खोटा सुना कर भेज दिया.

वो रोती हुई कमरे से चली गई और सुबह उठा तो एक लेटर मिला जिसमें उसने लिखा कि वो अपने प्रेमी के साथ जा रही है।

मैंने वो लेटर उसकी माँ को दिखाया तो वो रो पड़ी, मां का गहरा सदमा लगा, उसकी हालत खराब हो गई.
अब मेरे बच्चे की जिम्मेदारी मेरी सबसे छोटी साली ने ले लिया और मैं और वो दोनों बच्चे की और मां की देख रेख करने लगे।

एक दिन जब मैं अपने पत्नी की फोटो देख रहा था तो मैंने देखा कि मेरी साली मुझे देख रही थी. मैं दुखी था, उसी समय उसने मेरे सर को अपने सीने से लगा लिया और कहा- जीजू, आप दुखी मत हो, जो होना था, वो हो चुका, अब हमें अपने परिवार की जिम्मेदारी निभानी है, मैं अपनी दीदी की जगह तो नहीं ले सकती मगर उनकी याद को जरूर कुछ कम करने का प्रयास करूंगी यदि आप चाहें तो!

मैंने उसे अपने गले लगा लिया और उसके इस बलिदान को जिन्दगी भर याद रखने की कसम खाई.

और अब हम पति और पत्नी के समान जीवन यापन कर रहे हैं जिसमें मेरे साथ मेरा अपना परिवार भी है।

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